खून से लाल हुआ था बिहार

बिहार पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक, साल 2000 से 2005 की पांच साल की अवधि में 18,189 हत्याएं हुईं। इस आंकड़े को ध्यान में रखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि 15 सालों में 50 हजार से ज्यादा लोग मौत के घाट उतार दिए गए। हैरानी की बात यह है कि सिर्फ घोषित अपराधी ही मर्डर नहीं किया करते बल्कि सांसदों-विधायकों के इशारों पर भी हत्याएं होती थीं। सीवान के सांसद शहाबुद्दीन की करतूतों को भला कौन भूल सकता है।

जातीय हिंसा का दौर

लालू-राबड़ी के राज में बिहार जातीय हिंसा की आग में झुलस गया था। नक्सली वारदातों का जवाब देने के लिए अगड़ी जातियों और खासकर भूमिहारों ने रणबीर सेना का गठन किया। इन दोनों संगठनों ने एक-एक बार में सैकड़ों लोगों की हत्याएं कर बिहार की धरती को रक्तरंजित कर दिया था। भोजपुर के सहार स्थित बथानी टोला नरसंहार हो या जहानाबाद के अरवल स्थित लक्ष्णपुर बाथे कांड अथवा अरवल के ही शंकरबिगहा कांड, इन नरसंहारों को कोई भुला नहीं सकता। बिहार में जातीय हिंसा का अंत 16 जून, 2000 को औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में हुए नरसंहार से माना जा सकता है। इस घटना में यादव जाति के 33 लोग मारे गए थे। रणबीर सेना की ओर से हर कार्रवाई का जवाब देने वाले नक्सलियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी।

जाति की राजनीति

लालू यादव को सामाजिक न्याय के प्रतीक पुरुष के रूप में देखा जाता है। लेकिन, सच्चाई यह भी है कि उन्होंने दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों को आवाज देने के लिए तथाकथित उच्च जातियों पर जुल्म किए। लालू पर जाति की राजनीति को परवान चढ़ाने का भी आरोप लगता रहा है। इस आरोप के समर्थन में लोग लालू के ‘हमको परवल बहुत पसंद है, भूरा बाल साफ करो’ जैसे जुमले याद दिलाते हैं। परवल का पूरा-पूरा मतलब पाण्डेय यानी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य यानी बनिया और लाला से लगाया जाता है, वहीं भूरा का मतलब भूमिहार और राजपूत से और बाल से तात्पर्य ब्राह्मण और लाला जाति से लगाया जाता है।

विकास में फिसड्डी हुआ बिहार

लालू-राबड़ी के शासनकाल में विकास के मामले में बिहार की स्थिति जर्जर हो गई। नए उद्योग-धंधे लगने की बात तो दूर, पहले से चल रहे उद्योग भी बंद हो गए। रोजगार के लिए लोगों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ा। शिक्षा की हालत ऐसी कर दी गई कि आज भी बिहार इससे पूरी तरह से उबर नहीं पा रहा है। लालू कहा करते थे, डॉक्टर, इंजिनियर तो अमीर लोग के बेटा-बेटी बनता है, गरीब तो चरवाहा बनता है। इसलिए लालू ने चरवाहा विद्यालय खोल दिया। इन चरवाहा विद्यालयों का मकसद क्या था, इनमें कौन सी पढ़ाई पढ़ाई जानी थी, इसका अंदाजा आज भी नहीं लगाया जा सका। हां, इन स्कूलों के नाम पर जारी फंड में भरपूर भ्रष्टाचार हुआ। शिक्षा की बदतर हालत ने बिहार के युवाओं को राज्य से बाहर जाने को मजबूर कर दिया। यही हालत सड़कों की थी। तब एक कहावत मशहूर हो गई कि बिहार की सड़कों में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़कें, ये पता नहीं चल पाता।

घोटालों की बाढ़

यूं तो लालू ने खुद को ‘गुदड़ी का लाल’ के रूप में पेश किया और इसी शीर्षक से स्कूलों की पाठ्य पुस्तक में एक अध्याय भी जुड़वाया गया था, जिसमें उनके जीवन संघर्ष का बखान किया गया और उन्हें गरीबों के मसीहा के तौर पर पेश किया गया। लेकिन, हकीकत यह है कि सत्ता मिलते ही लालू ने उन्हीं गरीबों की हकमारी कर घोटाले किए। गरीबों की कल्याणकारी योजनाओं के पैसे डकार गए, चारा घोटाले पर तो आज भी उन्हें तीखे जुमलों का सामना करना पड़ता है। लेकिन, कहते हैं ना कि न्याय तो होता ही है, भले ही थोड़ी देर से हो। आज लालू प्रसाद यादव चुनाव भी नहीं लड़ सकते। इसलिए, अपने दोनों बेटों को राजनीति के मैदान में उतार चुके हैं।