वोहरा रिपोर्ट कहा गया है कि देश के कुछ प्रदेशों में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी अफसरों का संरक्षण हासिल है।

नरेंद्र मोदी की सरकार के गठन के बाद अब तक वोहरा कमेटी की रपट पर कोई चर्चा नहीं सुनी गयी है। यानी लगता है कि रपट सन 1993 से ही केंद्र सरकार की आलमारी में धूल खा रही है।क्या मोदी सरकार ने उसे देखा है ? उस रपट में कतिपय सरकारी अफसरों, नेताओं और देश के माफिया गिरोहों के बीच के अपवित्र गठबंधन का जिक्र है।उस गठबंधन को तोड़ने के उपाय भी रपट में सुझाए गये हैं। समिति की सिफारिश आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लाॅबियों, तस्कर गिरोहों ,माफिया तत्वों के साथ कुछ प्रभावशाली नेताओं और अफसरों की बनी आपसी सांठगाठ से संबंधित है। काले धन, अपराध, भ्रष्टाचार और देशद्रोह के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए इस रपट से खास रोशनी मिलती है।

पांच दिसंबर, 1993 को तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एन.एन.वोहरा द्वारा सरकार को पेश रपट में कहा गया है कि ‘ इस देश में अपराधी गिरोहों ,हथियारबंद सेनाओं, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले माफिया गिरोहों,तस्कर गिरोहों,आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय लाॅबियों का तेजी से प्रसार हुआ है।इन लोगों ने विगत कुछ वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों,सरकारी पदों पर आसीन लोगों , राज नेताओं,मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक संपर्क विकसित किये हैं।इनमें से कुछ सिंडिकेटों की विदेशी आसूचना एजेंसियों के साथ- साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय सबंध भी हैं।’

वोहरा रपट में यह भी कहा गया है कि इस देश के कुछ बड़े प्रदेशों में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का संरक्षण हासिल है। समिति ने यह भी कह दिया  था कि ‘तस्करों के बड़े -बड़े सिंडिकेट देश के भीतर छा गये हैं और उन्होंने हवाला लेन-देनों , काला धन के परिसंचरण सहित विभिन्न आर्थिक कार्यकलापों को प्रदूषित कर दिया है। यह भी कहा गया था कि ‘कुछ माफिया तत्व नारकोटिक्स,ड्रग्स और हथियारों की तस्करी में संलिप्त हैं। चुनाव लड़ने जैसे कार्यों में खर्च की जाने वाली राशि के मददेनजर राजनेता भी इन तत्वों के चंगुल में आ गये हैं

वोहरा समिति की बैठक में आई.बी.के निदेशक ने साफ- साफ कहा था कि ‘माफिया तंत्र ने वास्तव में एक समानांतर सरकार चला कर राज्य तंत्र को एक विसंगति में धकेल दिया है।’ क्या मोदी सरकार ने इस बात का आकलन किया है कि इन मामलों में 1993 और 2020 में कितना फर्क आया है ? उस रपट पर अब भी कार्रवाई करने की जरूरत है भी या नहीं ?