हिमांशु मित्तल/कोटा: देश का अन्नदाता आंदोलन की राह पर खड़ा है. मौजूदा हालातों का देखते हुए ये कहना गलत नहीं है कि किसान आरपार की लड़ाई के लिए तैयार हैं. लेकिन समझने वाली बात ये है कि किसान आखिरकार सड़क पर क्यों उतरा. क्या वजह है कि खेत में काम करने वाला किसान आज अपने औजारों के साथ सड़क पर आ चुका है,वो भी विरोध के सुर अख्तियार किए हुए.

किसान बनाम सरकार
देश में किसान बनाम सरकार जैसे हालात पैदा हो गए है. केंद्र सरकार के किसान कानून के विरोध में जंग छिड़ी हुई है. किसान केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद हो चुके हैं और उनकों विपक्षी दलों का साथ मिल रहा है. लेकिन सवाल ये है कि किसान जो केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, उनमें कितनी सच्चाई है. कहीं इस आंदोलन के पीछे कोई राजनीतिक शह तो नहीं है. हकीकत क्या है, इसकी तह तक जी मीडिया की टीम पहुंची है और आपके सामने लाई है. पिछले 10 साल का वो लेखा जोखा, जो ये साबित कर देगा कि किसानों को बरगलाया जा रहा है या फिर अन्नदाता के वाकई आंसू निकले जा रहे है.

पिछले 10 सालों का लेखा-जोखा
चाहे कांग्रेस हो या फिर बीजेपी दोनों ही पार्टियां खुद को किसानों का हितैषी बताती रही हैं. लेकिन पिछले 10 सालों के आंकड़े दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे. विश्व खाद्य दिवस (World Food Day) पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा था कि ‘इस सरकार ने गेहूं ओर धान की खरीद में पिछले सभी रिकॉर्ड को ध्वस्त करके अत्याधिक मात्रा में खरीद कर नया रिकॉर्ड बनाया है. इसी पर अब सूचना के अधिकार के तहत सामने आए दस्तावेजों की जानकारी से साल 2010-11 से साल 2020-21 तक का गेहूं ओर धान की खरीद का डाटा सामने आया है. जिसमे मोदी और मनमोहन सिंह सरकार के समय की गई गेहूं ओर धान की खरीद का पता चला है.

मोदी सरकार में गेहूं-धान की रिकॉर्ड खरीददारी
कोटा के सामाजिक कार्यकर्त्ता सुजीत स्वामी ने एक RTI में फूड कॉरपोरेशन इंडिया (FCI) में सितंबर महीने में  दायर की थी, जिसके बदले में फूड कारपोरेशन इंडिया ने अक्टूबर महीने में उक्त आरटीआई का जवाब दिया एवं राज्यों के अनुसार, गेहूं, धान एवं दालों की MSP पर की गई खरीद की जानकरी मुहैया करवाई. साल 2010-11 से 2020-21 में 15 राज्यों से गेहूं की खरीद की गई. गेहूं खरीद की मात्रा हर साल बदलती रही और गेहूं खरीद की मात्रा वर्ष 2010-11 के मुकाबले, वर्ष  2020-21 में रिकॉर्ड बढ़कर 170 प्रतिशत तक हो गई, जबकि 2010-11 में यूपीए सरकार के दौरान खरीद किया गया गेहूं 225.13 लाख मीट्रिक टन रहा जो वर्ष 2020-21 में एनडीए सरकार में बढ़कर 389.92 लाख मीट्रिक टन हो गया. उसी प्रकार गेहूं की मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ोतरी में भी मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार से बाजी मारी है. 

मनमोहन सरकार के समय अधिकतम 50 रुपए की बढ़ोतरी मिनिमम सपोर्ट प्राइस में की गई, जबकि मोदी सरकार ने वर्ष 2017-18 में 110 रुपए की बढ़ोतरी कर पिछले आठ वर्षो का अधिकतम बढ़ोतरी का रिकॉर्ड बनाया. वर्ष 2012-13 में गेहूं खरीद की मिनिमम सपोर्ट प्राइस 1350 रुपए रही जबकि 625 रुपए बढ़कर 2020-21 में यह 1975 रुपए हो गई.

उसी प्रकार धान खरीद की खरीद वर्ष 2010-11 से 2020-21 तक 26 राज्यों से की गई, जिसमें वर्ष 2010-11 के मुकाबले वर्ष 2019-20 में 150 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई. पिछले 10 सालों में सबसे कम धान वर्ष 2013-14 में खरीदी गई जबकि सबसे अधिक वर्ष 2019-20 में और जिसकी खरीद अभी भी जारी है. वर्ष 2013-14 में 318.45 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की गई. जबकि साल 2019-20 में 514.05 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की गई. मिनिमम सपोर्ट प्राइस की बात करें तो धान की मिनिमम सपोर्ट प्राइस में भी मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार के मुकाबले ज्यादा बढ़ोतरी की है.

पिछले 8 सालों में मिनिमम सपोर्ट प्राइस में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी 200 रुपए की रही जो साल 2018-19 में की गई थी. वर्ष 2012-13 में धान की मिनिमम सपोर्ट प्राइस 1250 रुपए थी जो वर्ष 2020-21 तक 618 रुपए बढ़कर 1868 रुपए हो गई. दालों की खरीद वर्ष 2015-16 से शुरू हुई. वर्ष 2010-2011 से लेकर वर्ष 2014-15 तक दालों की खरीद का आंकड़ा जीरो रहा, जबकि वर्ष 2016-17 यह अधिकतम 2.58 लाख मीट्रिक टन रहा. साल 2010-11 में अरहर की मिनिमम सपोर्ट प्राइस 3850 रुपए थी जबकि वर्ष 2020-21 में यह बढ़कर 6000 रुपए हो गई. मूंग दाल की मिनिमम सपोर्ट प्राइस वर्ष 2010-11 में 4400 रुपए थी, जबकि यह साल  2020-21 में 7196 रुपए हो गई.

यह जानकारी देने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ता सुजीत स्वामी का कहना है कि मोदी सरकार ने किसानों के हित में अधिकतम धान एवं गेहूं की खरीददारी अच्छी कीमतों में की. लेकिन अभी भी किसानों को और अधिक भुगतान की आवश्यकता है. मिनिमम सपोर्ट प्राइस में बढ़ोतरी का अनुपात और अधिक होना चाहिए ताकि किसान अपनी फसल की अच्छी कीमत प्राप्त कर सके.